“किसी का कोई सामान छूट गया हो तो देख लीजिए।”
कबीर बस की आखिरी सीट पर बैठा था। दिनभर कुरियर बाँटने के बाद उसका शरीर थक चुका था। वह उठने ही वाला था कि उसकी नजर सीट के नीचे पड़ी एक पुरानी नीले रंग की डायरी पर गई।
डायरी के किनारे फटे हुए थे और उसके ऊपर मिट्टी लगी थी।
कबीर ने उसे उठाकर कंडक्टर को देते हुए कहा—
“भैया, किसी की डायरी छूट गई है।”
कंडक्टर ने बिना देखे जवाब दिया—
“तुम रख लो। कल डिपो में जमा कर देना। इतनी पुरानी डायरी लेने कौन आएगा?”
कबीर डायरी को अपने बैग में रखकर घर चला आया।
उसका घर शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा किराए का कमरा था। खाना खाने के बाद उसने डायरी मेज पर रखी। वह उसे खोलना नहीं चाहता था, लेकिन डायरी के पहले पन्ने से बाहर निकला एक पुराना फोटो उसका ध्यान खींच रहा था।
फोटो में लगभग छह साल की एक बच्ची लाल फ्रॉक पहने मुस्कुरा रही थी। उसके एक पैर में पायल थी, जबकि दूसरा पैर खाली था।
फोटो के पीछे काँपते हाथों से लिखा था—
“मेरी गुड़िया, जहाँ भी हो, खुश रहना।”
कबीर कुछ पल फोटो को देखता रहा।
उसने डायरी का पहला पन्ना खोला।
ऊपर लिखा था—
“यह डायरी रामदीन की है। जिसे मिले, वह मेरी बेटी तक पहुँचा दे। शायद इसमें लिखी बातें उसे उसके पिता तक ले आएँ।”
नीचे कोई पूरा पता नहीं था। सिर्फ इतना लिखा था—
“पुराना रेलवे स्टेशन, पीपल के पेड़ के पास वाली झोपड़ी।”
कबीर ने अगले पन्ने पलटने शुरू किए।
17 जुलाई 2002
“आज मेरी गुड़िया छह साल की हो गई। सुबह उसने लाल फ्रॉक पहनने की जिद की। उसकी माँ ने बालों में दो लाल रिबन बाँधे। स्टेशन जाते समय मैंने उसे गोद में उठाया था।
शाम को शहर में बाढ़ का पानी घुसने लगा। स्टेशन पर हजारों लोग जमा हो गए। धक्का-मुक्की में मेरी गुड़िया का हाथ छूट गया।
मैंने सिर्फ दो मिनट के लिए उसका हाथ छोड़ा था।
सिर्फ दो मिनट…
और मेरी पूरी जिंदगी मुझसे छूट गई।”
कबीर ने पन्ने से नजर हटा ली।
उसे ऐसा लगा जैसे बूढ़े रामदीन की आवाज उसके सामने बैठकर यह सब कह रही हो।
उसने अगली तारीख पढ़ी।
20 जुलाई 2002
“तीन दिन से मैंने कुछ नहीं खाया। पुलिस चौकी, अस्पताल, राहत शिविर और हर गली में उसे खोज चुका हूँ।
एक आदमी ने कहा कि उसने लाल फ्रॉक वाली बच्ची को एक महिला के साथ जाते देखा था।
मुझे विश्वास है कि मेरी गुड़िया जीवित है।
उसके बाएँ कंधे के पीछे चाँद जैसा जन्म का निशान है। वह जहाँ भी होगी, इसी निशान से पहचान ली जाएगी।”
17 जुलाई 2003
“आज गुड़िया सात साल की हो गई होगी।
मैंने उसके लिए गुड़िया वाला खिलौना खरीदा है। उसकी माँ ने कहा कि वह लौटकर आएगी तो नाराज होगी कि हमने जन्मदिन नहीं मनाया।
हमने आज भी दो प्लेटों में खाना लगाया।
एक प्लेट वैसे ही पड़ी रही।”
कबीर की आँखें भर आईं।
उसने अपनी माँ को पाँच साल पहले खो दिया था। माँ की मृत्यु के बाद उसे पहली बार समझ आया था कि किसी अपने के चले जाने से घर खाली नहीं होता, इंसान के अंदर कुछ खाली हो जाता है।
वह रातभर डायरी पढ़ता रहा।
हर साल 17 जुलाई को रामदीन अपनी बेटी के नाम एक पन्ना लिखता था।
कभी वह उसके लिए फ्रॉक खरीदता, कभी किताबें, कभी चूड़ियाँ। हर जन्मदिन पर एक छोटा-सा उपहार खरीदकर लकड़ी के बक्से में रख देता।
एक पन्ने पर लिखा था—
4 जनवरी 2008
“आज गुड़िया की माँ भी चली गई।
आखिरी समय तक दरवाजे की तरफ देखती रही। उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा—
‘रामदीन, हमारी बेटी को खोज लेना। उसे कहना उसकी माँ ने आखिरी साँस तक उसका इंतजार किया।’
मैंने उसे वचन दिया है।
अब मुझे गुड़िया को खोजना ही होगा।”
कबीर ने डायरी बंद कर दी।
कमरे में पूरी तरह सन्नाटा था।
घड़ी रात के दो बजा रही थी, लेकिन कबीर की आँखों से नींद गायब हो चुकी थी।
उसने फैसला किया कि सुबह होते ही वह पुराने रेलवे स्टेशन जाएगा।
अगले दिन कबीर स्टेशन पहुँचा।
पुराना पीपल का पेड़ अब भी वहीं था, लेकिन उसके पास कोई झोपड़ी नहीं थी। वहाँ चाय की एक छोटी दुकान थी।
कबीर ने दुकानदार को डायरी दिखाते हुए पूछा—
“क्या आप रामदीन नाम के किसी व्यक्ति को जानते हैं?”
दुकानदार कुछ पल डायरी को देखता रहा। फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया।
“यह डायरी तुम्हें कहाँ मिली?”
“बस में छूट गई थी।”
दुकानदार ने गहरी साँस ली।
“रामदीन चाचा यहीं रेलवे स्टेशन पर कुली थे। पिछले बीस साल से अपनी बेटी को खोज रहे थे। हर आने-जाने वाली लड़की के चेहरे में अपनी गुड़िया को देखते थे।”
“वह अभी कहाँ हैं?”
दुकानदार की आँखें झुक गईं।
“तीन दिन पहले उनकी मृत्यु हो गई।”
कबीर स्तब्ध रह गया।
“लेकिन उनकी डायरी बस में कैसे पहुँची?”
दुकानदार ने बताया कि मृत्यु से एक दिन पहले रामदीन किसी सूचना के बाद शहर के महिला अस्पताल गए थे। वापस लौटते समय शायद डायरी बस में छूट गई थी।
कबीर ने पूछा—
“क्या उनकी बेटी के बारे में कोई जानकारी मिली थी?”
दुकानदार दुकान के अंदर गया और एक कागज लेकर लौटा।
“मरने से पहले उन्होंने यह पता मुझे दिया था। बोले थे कि शहर के सरस्वती विद्यालय में आशा नाम की एक अध्यापिका है। उन्हें लगता था कि वही उनकी गुड़िया हो सकती है।”
कागज पर एक स्कूल का पता लिखा था।
कबीर का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने उसी समय विद्यालय जाने का फैसला किया।
सरस्वती विद्यालय शहर के दूसरे छोर पर था।
कबीर ने कार्यालय में जाकर आशा शर्मा के बारे में पूछा। कुछ देर बाद लगभग तीस वर्ष की एक महिला बाहर आई। उसने हल्की नीली साड़ी पहन रखी थी और चेहरे पर शांत मुस्कान थी।
“आपको मुझसे कोई काम था?”
कबीर ने डायरी आगे बढ़ाते हुए कहा—
“यह शायद आपके पिता की है।”
आशा का चेहरा बदल गया।
“मेरे पिता घर पर हैं। उन्होंने मुझे बचपन से पाला है। आप शायद गलत व्यक्ति के पास आए हैं।”
“क्या आपको बचपन से पहले की कुछ बातें याद हैं?”
आशा नाराज हो गई।
“आप कहना क्या चाहते हैं?”
कबीर ने बच्ची वाला फोटो निकालकर उसके सामने रख दिया।
फोटो देखते ही आशा के हाथ काँपने लगे।
“यह फोटो… आपके पास कहाँ से आया?”
“डायरी में था।”
आशा ने फोटो को अपने हाथ में लिया। उसकी आँखें तस्वीर पर टिक गईं।
“यह लाल फ्रॉक… मेरे पास बचपन में ऐसी ही एक फ्रॉक थी। मेरी माँ ने बताया था कि जब उन्होंने मुझे पाया था, तब मैं यही पहने हुई थी।”
कबीर ने धीमे स्वर में पूछा—
“क्या आपके बाएँ कंधे के पीछे चाँद जैसा कोई निशान है?”
आशा कुछ नहीं बोली।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने कुर्सी पकड़कर खुद को संभाला।
कुछ देर बाद वह कबीर को कार्यालय के अंदर ले गई।
आशा ने बताया कि उसे बचपन की केवल टूटी-फूटी यादें थीं। तेज बारिश, रेलवे स्टेशन, बहुत सारे लोग और किसी आदमी की आवाज जो उसे “गुड़िया” कहकर पुकार रहा था।
बाढ़ वाली रात एक नर्स को वह स्टेशन के पास रोती हुई मिली थी। नर्स ने पुलिस को सूचना दी, लेकिन कोई पहचान न होने के कारण कई महीनों बाद उसने आशा को गोद ले लिया।
“मुझे हमेशा लगता था कि कोई मुझे खोज रहा है,” आशा ने रोते हुए कहा।
कबीर ने डायरी उसके सामने रख दी।
आशा पन्ने पढ़ने लगी।
कुछ पन्ने पढ़ने के बाद वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
“मेरे माता-पिता मुझे छोड़कर नहीं गए थे… मैं उनसे बिछड़ गई थी।”
कबीर ने उसे रामदीन की मृत्यु के बारे में नहीं बताया था।
आशा अचानक खड़ी हुई।
“मुझे अपने पिता से मिलना है। वह कहाँ हैं?”
कबीर चुप रहा।
“बताइए, वह कहाँ रहते हैं?”
कबीर की आँखें झुक गईं।
“आप तीन दिन देर से मिली हैं।”
आशा कुछ पल उसे देखती रही।
फिर जैसे उसके पैरों से शक्ति चली गई। वह कुर्सी पर बैठ गई।
“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता। उन्होंने बीस साल मेरा इंतजार किया और मैं उनसे एक बार भी नहीं मिल सकी।”
कबीर ने डायरी के अंतिम पन्ने की तरफ देखा।
उस पन्ने पर तारीख मृत्यु से दो दिन पहले की थी।
उसने डायरी आशा को देते हुए कहा—
“आखिरी पन्ना अभी बाकी है।”
आशा काँपते हाथों से पढ़ने लगी।
8 अगस्त 2025
“आज मैंने अपनी गुड़िया को देख लिया।
वह सरस्वती विद्यालय में बच्चों को पढ़ाती है। उसका नाम अब आशा है।
वह बिल्कुल अपनी माँ जैसी दिखाई देती है। उसके बाएँ कंधे के पास वही चाँद जैसा निशान है।
मैं स्कूल के बाहर दो घंटे खड़ा रहा। वह छुट्टी के बाद एक आदमी और औरत के साथ घर गई। उसने उन्हें माँ-पापा कहकर पुकारा।
वे दोनों उसे बहुत प्यार करते हैं।
मैं चाहता तो उसके सामने जाकर कह सकता था कि मैं उसका असली पिता हूँ, लेकिन मेरे पास उसे देने के लिए क्या है?
एक टूटी झोपड़ी, बूढ़ा शरीर और बीस साल के आँसू।
जिन लोगों ने उसे पाला, पढ़ाया और जिंदगी दी, उनका अधिकार मुझसे कम नहीं है।
मैंने अपनी बेटी को खोया जरूर था, लेकिन आज उसे खुश देखकर मैंने उसे फिर से पा लिया।
शायद मैं उससे कभी नहीं कह पाऊँगा कि मैं उसका पिता हूँ।
मेरी गुड़िया, तुम यह डायरी पढ़ रही हो तो अपने माता-पिता को कभी मत छोड़ना। उन्होंने तुम्हें वह जीवन दिया जो मैं शायद नहीं दे पाता।
बस कभी पुराने रेलवे स्टेशन आकर उस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी हो जाना।
वहीं तुम्हारा एक बूढ़ा पिता हर दिन तुम्हारा इंतजार करता था।
मैंने तुम्हें खोजा इसलिए नहीं कि तुम्हें किसी से छीन लूँ।
मैंने तुम्हें इसलिए खोजा था कि एक बार देख सकूँ—मेरी बेटी जीवित है और खुश है।”
आशा अंतिम पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते डायरी को अपने सीने से लगा चुकी थी।
उसकी आवाज टूट रही थी।
“उन्होंने मुझे पहचान लिया था… फिर भी मुझसे मिले नहीं।”
कबीर ने धीमे से कहा—
“शायद उन्हें डर था कि उनके आने से आपकी जिंदगी बदल जाएगी।”
आशा रोते हुए बोली—
“उन्हें किसने कहा कि मुझे उनकी टूटी झोपड़ी नहीं चाहिए थी? मुझे सिर्फ एक बार ‘बाबा’ कहने का मौका चाहिए था।”
उस दिन कबीर आशा को पुराने स्टेशन ले गया।
पीपल के पेड़ के पास रामदीन की झोपड़ी की जगह अब कुछ टूटी ईंटें पड़ी थीं। चाय वाले ने रामदीन का पुराना लकड़ी का बक्सा आशा को दिया।
बक्से में बीस छोटे-छोटे पैकेट रखे थे।
हर पैकेट पर एक उम्र लिखी हुई थी—
“सातवाँ जन्मदिन”
“आठवाँ जन्मदिन”
“नौवाँ जन्मदिन”
अंतिम पैकेट पर लिखा था—
“मेरी गुड़िया के तीसवें जन्मदिन के लिए।”
आशा ने पहला पैकेट खोला।
उसमें एक छोटी-सी गुड़िया थी।
दूसरे में रंगीन पेंसिलें थीं।
तीसरे में चूड़ियाँ।
एक पुराने कपड़े में छोटी-सी चाँदी की पायल लिपटी हुई थी। ठीक वैसी ही पायल, जैसी फोटो में उसके एक पैर में दिखाई दे रही थी।
रामदीन ने उसकी दूसरी पायल जीवनभर संभालकर रखी थी।
आशा पायल को हाथ में लेकर पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गई।
उसने पेड़ की जड़ों को छूते हुए कहा—
“बाबा, आपकी गुड़िया लौट आई है।”
उसकी आवाज सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन उसी समय पेड़ से एक सूखा पत्ता टूटकर डायरी के आखिरी पन्ने पर आ गिरा।
हवा धीरे-धीरे चल रही थी।
आशा को लगा जैसे कोई उसके सिर पर हाथ रखकर कह रहा हो—
“देर से ही सही, मेरी बेटी घर लौट आई।”
कुछ महीनों बाद आशा ने पुराने रेलवे स्टेशन के पास एक छोटा सहायता केंद्र शुरू किया। वहाँ खोए हुए बच्चों और उनके परिवारों को मिलाने का काम किया जाने लगा।
उस केंद्र का नाम रखा गया—
“रामदीन सहायता केंद्र।”
प्रवेश द्वार के अंदर शीशे के एक छोटे बक्से में वही नीली डायरी रखी गई।
उसके नीचे एक पंक्ति लिखी थी—
“कुछ लोग हमें छोड़कर नहीं जाते। वे पूरी जिंदगी हमें खोजते रहते हैं, बस हमें उनकी आवाज सुनाई नहीं देती।”
कबीर अक्सर उस सहायता केंद्र के सामने से गुजरता था।
हर बार उसकी नजर उस पुरानी डायरी पर पड़ती और वह सोचता—
उस रात बस में केवल एक डायरी नहीं खोई थी।
एक पिता की बीस वर्षों की प्रतीक्षा खो गई थी।
लेकिन शायद उस डायरी को खोना ही था, ताकि वह आखिरकार अपनी बेटी तक पहुँच सके।

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