रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे।
शहर की लगभग सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। सड़कों पर कभी-कभार किसी गाड़ी की आवाज सुनाई देती और फिर चारों तरफ वही गहरा सन्नाटा छा जाता।
राहुल अपने छोटे से कमरे में अकेला बैठा था। मेज पर ठंडी हो चुकी चाय रखी थी और सामने उसकी माँ की तस्वीर।
उस तस्वीर के नीचे सूखे फूलों की एक माला लटकी हुई थी।
राहुल की माँ को गुजरे हुए पूरे तीन साल हो चुके थे, लेकिन आज भी हर रात सोने से पहले वह उनकी तस्वीर देखकर कहता था—
“माँ, आज भी बहुत याद आई आपकी।”
राहुल के पिता बचपन में ही परिवार छोड़कर चले गए थे। उसकी माँ कमला देवी ने लोगों के घरों में बर्तन मांजकर और कपड़े धोकर उसे पढ़ाया था।
कई बार घर में खाना कम होता, तो माँ कहती—
“मुझे भूख नहीं है बेटा, तू खा ले।”
राहुल बचपन में सच मान लेता था।
बड़ा होने पर उसे समझ आया कि माँ को भी भूख लगती थी, लेकिन उनके हिस्से की रोटी हमेशा उसकी थाली में आ जाती थी।
माँ की एक ही इच्छा थी कि राहुल पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे और फिर दोनों एक बड़े से घर में रहें।
राहुल ने पढ़ाई पूरी की, नौकरी भी मिल गई, लेकिन जिस दिन उसकी पहली तनख्वाह आई, उस दिन माँ अस्पताल में भर्ती थीं।
वह तनख्वाह का लिफाफा लेकर अस्पताल पहुँचा और माँ के हाथ में रखते हुए बोला—
“देखो माँ, अब तुम्हें किसी के घर काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
कमला देवी ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं, राहुल के सिर पर हाथ रखा और धीमे से कहा—
“मुझे पता था, मेरा बेटा एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
उसी रात वह दुनिया छोड़कर चली गईं।
माँ की मौत के बाद राहुल ने नौकरी तो जारी रखी, लेकिन जीना जैसे भूल गया।
वह लोगों के सामने हँसता था, काम करता था, सबकी मदद भी करता था, लेकिन कमरे में लौटते ही उसकी आँखें माँ को खोजने लगतीं।
उस रात भी वह माँ की तस्वीर के सामने बैठा पुरानी यादों में खोया हुआ था कि अचानक उसका मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर एक अनजान नंबर दिखाई दे रहा था।
पहले उसने सोचा कि इतनी रात में जरूर किसी ने गलत नंबर मिला दिया होगा। उसने कॉल काट दी।
कुछ सेकंड बाद फिर उसी नंबर से कॉल आया।
राहुल ने इस बार फोन उठा लिया।
“हेलो?”
दूसरी तरफ कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।
फिर एक बूढ़ी और काँपती हुई आवाज सुनाई दी—
“बेटा… तुम राहुल बोल रहे हो?”
राहुल चौंक गया।
“जी, लेकिन आप कौन?”
बूढ़ी महिला ने जैसे रोते हुए कहा—
“बेटा, मुझे नहीं पता तुम कौन हो। मेरे पास एक पुरानी डायरी है। उसमें यह नंबर लिखा था और आगे लिखा था—‘मुसीबत में केवल राहुल को फोन करना।’”
राहुल का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“आप कहाँ हैं?”
महिला ने बताया कि वह शहर के सरकारी अस्पताल के बाहर बैठी हैं। उनका बेटा सड़क दुर्घटना में घायल हो गया था। अस्पताल वाले इलाज शुरू करने से पहले पैसे जमा करने के लिए कह रहे थे।
राहुल ने घड़ी देखी। बाहर तेज ठंड थी।
उसने एक पल भी देर नहीं की। जैकेट पहनी, पैसे लिए और अस्पताल की तरफ निकल गया।
अस्पताल पहुँचकर उसने देखा कि एक वृद्ध महिला जमीन पर बैठी रो रही थीं। उनके कपड़े पुराने थे और पैरों में चप्पल भी टूटी हुई थी।
राहुल उनके पास गया।
“माँ जी, आपने ही फोन किया था?”
महिला ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखें लाल थीं।
उन्होंने काँपते हाथों से एक छोटी-सी डायरी राहुल को दी।
डायरी खोलते ही राहुल के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसमें लिखा नंबर उसकी माँ की लिखावट में था।
राहुल ने महिला की तरफ देखा और भर्राई आवाज में पूछा—
“आप मेरी माँ को कैसे जानती थीं?”
महिला ने आँसू पोंछते हुए कहा—
“तीन साल पहले मैं और तुम्हारी माँ एक ही अस्पताल में भर्ती थे। मेरे पास दवा खरीदने के पैसे नहीं थे। तुम्हारी माँ ने अपनी दवा के पैसे मुझे दे दिए थे।”
राहुल कुछ नहीं बोल पाया।
महिला आगे कहने लगीं—
“मैंने उनसे कहा था कि बहन, तुम्हारा बेटा क्या कहेगा? तब वह मुस्कुराकर बोली थीं—‘मेरा राहुल कभी किसी मजबूर इंसान को खाली हाथ नहीं लौटाएगा।’”
राहुल की आँखों से आँसू बहने लगे।
महिला ने डायरी का एक पन्ना खोलकर उसे दिखाया।
उस पन्ने पर उसकी माँ ने लिखा था—
“अगर कभी मेरा बेटा तुम्हें मिले, तो उसे कहना कि उसकी माँ को उस पर बहुत गर्व था। मैं शायद उसके साथ उसके बड़े घर में न रह सकूँ, लेकिन वह जहाँ भी रहेगा, मेरी दुआ उसके साथ रहेगी।”
राहुल उस डायरी को सीने से लगाकर वहीं अस्पताल की बेंच पर बैठ गया।
तीन साल से वह यही सोचता रहा था कि वह माँ की कोई इच्छा पूरी नहीं कर पाया।
उसे लगता था कि पहली तनख्वाह आने में उसने बहुत देर कर दी।
उसे लगता था कि माँ उससे नाराज होकर चली गईं।
लेकिन आज आधी रात की उस अनजान कॉल ने उसे बता दिया था कि उसकी माँ अंतिम साँस तक उस पर गर्व करती थीं।
राहुल ने महिला के बेटे के इलाज के सारे पैसे जमा कर दिए।
डॉक्टर उसे ऑपरेशन थिएटर में ले गए।
करीब दो घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए और बोले—
“अब खतरे की कोई बात नहीं है।”
महिला ने राहुल के पैर पकड़ लिए।
“बेटा, तुमने मेरा बेटा बचा लिया।”
राहुल तुरंत नीचे बैठ गया और उनके हाथ पकड़कर बोला—
“माँ जी, मैंने किसी पर एहसान नहीं किया। आज मेरी माँ ने तीन साल बाद मुझे फोन किया है।”
वृद्ध महिला कुछ समझ नहीं पाईं।
राहुल ने रोते हुए कहा—
“कॉल आपने की थी, लेकिन नंबर मेरी माँ ने दिया था।”
उस रात राहुल अस्पताल से सुबह करीब पाँच बजे घर लौटा।
उसने माँ की तस्वीर के सामने वह पुरानी डायरी रखी और पहली बार उसके चेहरे पर आँसुओं के साथ हल्की-सी मुस्कान आई।
वह तस्वीर के सामने बैठकर बोला—
“माँ, आपका बेटा बड़ा आदमी तो नहीं बन पाया, लेकिन आज आपकी बात जरूर रख ली।”
खिड़की से सुबह की हल्की रोशनी कमरे में आ रही थी।
माँ की तस्वीर पर पड़ी सूखी माला धीरे-धीरे हवा से हिल रही थी।
राहुल को ऐसा लगा जैसे माँ फिर से उसके सिर पर हाथ रखकर कह रही हों—
“मुझे पता था बेटा, तू किसी मजबूर को अकेला नहीं छोड़ेगा।”
उस दिन के बाद राहुल ने अपना मोबाइल नंबर कभी बंद नहीं किया।
उसे हमेशा लगता था कि शायद किसी रात फिर कोई अनजान कॉल आए…
और दूसरी तरफ से उसकी माँ की कोई अधूरी दुआ उसे पुकार रही हो।

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